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वाहन के बेचने के साथ बीमे का ट्रान्सफर नहीं - बीमा कंपनी कितनी जिम्मेदार

           वाहन के बेचने के साथ बीमे का ट्रान्सफर नहीं - बीमा कंपनी कितनी जिम्मेदार 

प्रायः ऐसा होता है कि वाहन खरीदने के साथ ही सभी दस्तावेजो पर ब्लैंक साइन लेने के बाद तुरत रजिस्ट्रेशन अपने नाम करने का पहला काम सूझता है ।  इस बात की ताकीद बेचने वाला व्यक्ति भी करता है ओर कई बार तो रजिस्ट्रेशन ट्रान्सफर कराने का जिम्मा भी स्वयं ही ले लेता है । इस बात के पीछे मंशा यह भी होती है कि वाहन बेच देने के बाद खरीददार यदि ट्रांसपोर्ट  नियमो का उलंघन करता है तो कोई चालान आदि उसके नाम न कट जाए। शेष दस्तावेज़ बीमा पॉलिसी अपने नाम कराने तथा अनय सभी कानूनी कार्यो के लिए अथॉरिटी पत्र होते है जो फॉर्म के रूप मे खरीददार को भर कर समुचित स्थान पर पहुचाने होते है । बीमा के मामले मे  वाहन की रजिस्ट्री के साथ पॉलिसी भी  अपने नाम करानी होती है ओर यदि पॉलिसी की अवधी समाप्त हो रही हो तो खरीददार को फ्रेश पॉलिसी बनवानी होती है । दोनों ही स्थितियो मे मोटर वहिकल एक्ट  के तहत  थर्ड पार्टी बीमा होना आवश्यक होता है । होता यह है कि रजिस्ट्रेशन ट्रान्सफर का पहला काम तो साथ ही साथ सभी करा लेते है, पॉलिसी  अपने नाम करने मे प्रायः ढील ढाल का रवेया रहता है ।प्रश्न यह उठता है कि ऐसे मे कोई दुर्घटना हो जाए तो उसका मुआवजा किसके सिर पड़ेगा । क्या बीमा कंपनी अपने दायित्व से मुह मोड सकती है।

इसके कानूनी पक्ष को यदि देखे तो सबसे पहले मोटर वेहिकल एक्ट की धारा 157 के अनुसार वाहन के रजिस्ट्रेशन के ट्रान्सफर के साथ ही बीमा भी स्वतः ट्रान्सफर माना जाता है किन्तु उसके लिए धारा 157 (२) के तहत समुचित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है जिससे बीमा कंपनी मे वाहन के साथ बीमा ट्रान्सफर भी अंकित हो जाता है।वाहन के ट्रान्सफर की स्थिति मे दो थर्ड पार्टिया हो जाती है –पहला खुद खरीदार ओर दूसरा कोई भी व्यक्ति जो सड़क दुरघटना का शिकार होता है । मोटर वेहिकले एक्ट की धारा ९४ ओर ९५ की व्याख्या करते हुए  अदालतों का यह मानना है कि वाहन का खरीददार बीमा कंपनी के नियमानुसार  बीमा स्ट्रांस्फर की प्रक्रिया पूरी नहीं करता तो दुर्घटना होने पर बीमाँ का लाभ नहीं उठा सकता । किन्तु अपरिचित व्यक्ति जो दुर्घटना का शिकार होता है उसके लिए बीमाँ कंपनी जिम्मेदार होगी ,धारा १५७ का यही आशय है । यह बीमाँ  कंपनी पर निर्भर करता है कि वह इस मुआवजे को भी वाहन के मालिक से बाद मे वसूल करे या न करे ।ऐसा फेसला सर्वोच न्यायालय ने वर्ष 2003 मे रिखी राम तथा अनय बनाम सुखरानिया तथा अनय  (2003) के मामले मे मोटर वेहिकल एक्ट की धारा 157,157(2) धारा 94 &95 की विषद व्याख्या करके किया ओर सारे विवाद का अंत कर दिया था।

इससे पहले भी इस संदर्भ मे सर्वोच न्यायालय  ने अपने 1996 के कंप्लीट इन्स्युलेशन प्रा. ली॰ बनाम न्यू इंडिया एशुरेंस कंपनी लि के मामले मे यह माना था की रजिस्ट्रेशन ट्रान्सफर न करने पर बीमा कंपनी किसी प्रकार के मुआवजे के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकती,यहा बात वाहन के रजिस्ट्रेशन की थी ।इस केस मे खरीददार से जब रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट तथा  सालवेज मांगी गई तो यह बात सामने आई कि घटना के समय तक रजिस्ट्रेशन ट्रान्सफर नहीं हुई थी ।   

इसी प्रकार यूनाइटेड इंडिया इन्शुरेंस कंपनी बनाम हरिंदर कौर (2007) के मामले मे भी यह पाया गया कि पंजाब सिंह ने मारुति कार खरीदने के बाद उसे 20.9.2002 को अपने नाम ट्रान्सफर करा ली पर कार का बीमा पॉलिसी जो अभी पिछले मालिक के नाम 27.7.2002 से  26.7.2003 तक वेध  थी ट्रान्सफर नही कराई थी ।दुर्घटना 3.3.2003 को हुई ओर तब तक पंजाब सिंह की तरफ से बीमा ट्रान्सफर के लिए  कोई कदम भी नहीं उठाए गए । उपभोक्ता अदालत तथा स्टेट कमीशन ने उपभोक्ता के पक्ष मे आदेश दिये पर नॅशनल कमीशन ने निचली दोनों अदालतों के फासले उलट दिये ओर  बीमा कंपनी को जिम्मेदार नहीं माना।

हाल ही मे नेशनल कमीशन ने एक ऐसा ही फैसला किया है जिससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट होती है कि वाहन खरीदने के साथ पॉलिसी का ट्रान्सफर न किए जाने पर बीमा का लाभ वाहन का मालिक नहीं ले सकता । संदीप गुप्ता  ने जीत सिंह तथा  प्रेम सिघ से १३.११.२००५ को ट्रक संख्या पी बी -३२ ए ४७९७ खरीदा जिसका बीमा ९.११.२००५ से ८.११.२००६ तक वैध था । दुरभग्य से 13.4.2006 को वह चोरी हो गया जिसकी पुलिस मे रिपोर्ट भी हुई ओर बीमा कंपनी को भी सूचित किया गया । बीमा का दावा पेश करने पर बीमा कंपनी ने इस अधार पर दावा खारिज कर दिया की वाहन के ट्रान्सफर की बात बीमा कंपनी को सूचित नही की गई ।संदीप गुप्ता का तर्क यह था की मोटर वेहिकले एक्ट की धारा 157 के तहत वाहन के ट्रान्सफर के साथ ही बीमा भी ट्रान्सफर हो जाता है,धारा 157(2) महज एक प्रक्रिया है ।  उपभोक्ता अदालत ने संदीप गुप्ता को राहत देते हुए बीमा कंपनी को दावा पास करने के आदेश दिये किन्तु स्टेट कमीशन ने फॉरम के आदेश  को उलट दिया तथा माना की जब बीमा कंपनी को वाहन ट्रान्सफर की सूचना  ही नहीं है तो उसका दायित्व भी नहीं बनता । मामला नॅशनल कमीशन मे आया तो सर्वोच न्यायालए के अनेकों पहले के आदेशो के आधार पर नेशनल कमीशन ने भी स्टेट कमीशन के आदेश को सही माना तथा इस बात पर बल दिया की प्रक्रिया जब है तो उसका पालन करना भी आवश्यक है ।

इस सारे प्रकरण से कुछ बाते स्पष्ट होती है-

1.   पुराना वाहन खरीदने की  स्थिति मे रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट मे अपना नाम तुरत स्थानांतरित करवाना चाहिए अन्यथा वाहन पहले के मालिक के ही नाम माना जाएगा।

2.    चूकी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट पहले के मालिक के ही नाम माना जाएगा , वही सभी कानूनी दायित्वों को वहन करेगा। किन्तु बेचने के फार्म पर हस्ताक्षर कर के अपना बेचने का काम कर चुकने के कारण  ओर पैसे की रसीद जारी कर चुकने के कारण पहले मालिक को भी  बीमा आदि के लाभों का हकदार नहीं माना जा सकेगा ।

3.   रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट ट्रान्सफर न होने की  स्थिति मे या बीमा स्थानातरित न होने की 

स्थिती  मे खरीददार को बीमा का लाभ नहीं मिलेगा । तथापि थर्ड पार्टी को हुए जान माल के नुकसान के लिए बीमा कंपनी का दायित्व बनेगा ।

 

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